BHU में तीन दिवसीय “वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में शांति शिक्षण” विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ।

तीन दिवसीय “वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में शांति शिक्षण” विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ
● संघर्षों को सहयोग में बदलने के लिए संवाद और सहानुभूति को बढ़ावा देना आवश्यक है; शांति निर्माण की शुरुआत सूक्ष्म स्तर से होनी चाहिए – कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी
● अधिकारों की मांग करने के लिए सबसे पहली शर्त अस्तित्व है; इसलिए वैश्विक संकट के समय जीवन के अधिकार की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए – प्रो. समीर कुमार दास
वाराणसी:16.03.2026: “वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में शांति शिक्षण” विषय पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का सोमवार को मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र में शुभारंभ हुआ। इस संगोष्ठी का आयोजन काशी हिंदू विश्वविद्यालय के मालवीय सेंटर फॉर पीस रिसर्च द्वारा यूनेस्को चेयर फॉर पीस एंड इंटरकल्चरल अंडरस्टैंडिंग के अंतर्गत किया जा रहा है। 16 से 18 मार्च 2026 तक चलने वाली इस संगोष्ठी में देश-विदेश के विद्वान, शोधकर्ता और विशेषज्ञ समकालीन वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में शांति शिक्षा की भूमिका पर विचार-विमर्श करेंगे।
मुख्य अतिथि के रूप में कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने अपने संबोधन में शांति पर सतत संवाद की आवश्यकता पर बल दिया और उल्लेख किया कि भारत में पहले की तुलना में हड़तालों और आंदोलनों की घटनाएं काफी कम हो गई हैं। उन्होंने इस परिवर्तन का श्रेय संवैधानिक शासन व्यवस्था के विकास, न्यायपालिका की भूमिका और ऐसे संस्थागत तंत्रों को दिया जो विवादों के समाधान के लिए संवाद को बढ़ावा देते हैं। वैश्विक (मैक्रो) और स्थानीय (माइक्रो) स्तर पर शांति के बीच संबंध पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि राजनीतिक विज्ञान जैसे शैक्षणिक विषयों ने ऐसी शासन संरचनाओं के विकास में योगदान दिया है जो स्थिरता और न्याय को प्रोत्साहित करती हैं। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि मालवीय सेंटर फॉर पीस रिसर्च को छात्रों को इंटर्नशिप और सामुदायिक संपर्क कार्यक्रमों के माध्यम से जोड़ना चाहिए, ताकि वे लोगों की समस्याओं को रचनात्मक रूप से समझकर उन्हें संवाद और उचित संस्थागत माध्यमों की ओर मार्गदर्शन दे सकें। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने विद्वानों से आग्रह किया कि वे केवल वैश्विक ढांचों पर ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर शांति को मजबूत करने वाले व्यावहारिक प्रयासों पर भी ध्यान दें।
संगोष्ठी की थीम प्रस्तुत करते हुए प्रो. प्रियंकर उपाध्याय, यूनेस्को चेयर फॉर पीस, बीएचयू ने विश्व में शांति के सामने बढ़ते खतरों पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि ‘डूम्सडे क्लॉक’ वर्तमान में आधी रात से 85 सेकंड पहले पर निर्धारित है, जो वैश्विक संकटों की गंभीरता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि शांति शिक्षा को अक्सर रणनीतिक और सुरक्षा अध्ययन की तुलना में कम महत्व दिया जाता है, जबकि इसकी आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूनेस्को द्वारा शांति शिक्षा को बढ़ावा देने की पहल को याद करते हुए उन्होंने शांति और संवाद को विकसित करने वाली शिक्षण पद्धतियों को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने शांति अध्ययन के उपनिवेशवाद से मुक्त दृष्टिकोण, स्वदेशी परंपराओं के समावेशन तथा युवाओं और डिजिटल नवाचारों की भूमिका को भी रेखांकित किया और शांति शिक्षा के प्रभावी मॉडल विकसित करने के लिए व्यापक शैक्षणिक सहयोग की आवश्यकता बताई।
मुख्य वक्ता के रूप में अपने संबोधन में उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. समीर कुमार दास ने समकालीन विश्व में बढ़ती अनिश्चितताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न विस्थापन, श्रम असुरक्षा और कोविड-19 महामारी जैसी परिस्थितियों ने वैश्विक स्तर पर नई चुनौतियाँ उत्पन्न की हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी अनिश्चितताएँ अक्सर अप्रत्याशित और अभूतपूर्व होती हैं, जो शांति और जीवन के मौलिक अधिकार के लिए गंभीर चिंताएँ पैदा करती हैं। शांति अनुसंधान के पुनर्विचार की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि इसे केवल सुरक्षा के दृष्टिकोण तक सीमित न रखते हुए जीवन की रक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए। दार्शनिक हन्ना अरेंट के “राइट टू हैव राइट्स” के विचार का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अधिकारों की मांग के लिए किसी राजनीतिक समुदाय में अस्तित्व बनाए रखना अनिवार्य है। उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच समाजों को यह विचार करना होगा कि वे शांति और मानव गरिमा की रक्षा किस प्रकार कर सकते हैं।
स्वागत भाषण देते हुए मालवीय सेंटर फॉर पीस रिसर्च के समन्वयक प्रो. मनोज कुमार मिश्रा ने वर्तमान वैश्विक संदर्भ में शांति और अंतर-सांस्कृतिक समझ को बढ़ावा देने के लिए संवाद और शैक्षणिक विमर्श की आवश्यकता पर बल दिया।
प्रो. अंजू शरण उपाध्याय, PRIO ग्लोबल फेलो ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए “थिन पीस” और “थिक पीस” के बीच अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि “थिन पीस” केवल अस्थायी युद्धविराम को दर्शाता है, जबकि “थिक पीस” संघर्षों के गहरे संरचनात्मक कारणों को संबोधित करता है। उन्होंने टिकाऊ और सार्थक शांति के निर्माण के लिए एकजुटता, संवाद और समन्वित प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।
यह संगोष्ठी आगामी दो दिनों तक विभिन्न पूर्ण सत्रों और तकनीकी सत्रों के माध्यम से जारी रहेगी, जिनमें भारत और विदेशों से आए विद्वान शांति शिक्षण और वैश्विक अनिश्चितताओं के विभिन्न आयामों पर अपने शोधपत्र प्रस्तुत करेंगे तथा विचार-विमर्श करेंगे।

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