Varanasi:काशी विश्वनाथ धाम में लगी वैदिक घड़ी,भक्तों को मिलेगी अब पंचांग से जुड़ी सभी जानकारी।

विकट संकष्टी चतुर्थी 05 अप्रैल विशेष
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हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल वैशाख माह की चतुर्थी तिथि के दिन वैशाख संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाएगा। यह व्रत कृष्ण पक्ष में रखी जाती है। इस दिन विशेष रूप से भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करने का विधान है। इस दिन कई जातक व्रत भी रखते हैं। ऐसी मान्यता है कि जो जातक इस व्रत को रखते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती है। साथ ही जीवन में चल रही सभी कलह-क्लेश से भी छुटकारा मिल सकता है। यह व्रत विशेष रूप से व्यापारियों के लिए उत्तम फलदायी माना जाता है।

कब है विकट संकष्टी चतुर्थी?
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हिंदू कैलेंडर के अनुसार, विकट संकष्टी चतुर्थी व्रत का मुहूर्त 05 अप्रैल को दोपहर 12 बजकर 57 मिनट से आरंभ हो रहा है और इस तिथि का समापन 06 अप्रैल को दोपहर 02 बजकर 09 मिनट पर होगा। इसलिए चन्द्र उदय तिथि के हिसाब से विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत 05 अप्रैल को रखा जाएगा। इस दिन साधक भगवान गणेश की पूजा विधिवत रूप से कर सकते हैं और व्रत भी रख सकते हैं।

विकट संकष्टी चतुर्थी पूजा का शुभ मुहूर्त
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विकट संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त के बारे में जान लें।

सायं काल का मुहूर्त 👉 सायं 06:19 से सुबह 08:05 तक है।

अभिजीत मुहूर्त 👉 दोपहर 11:57 से 12:46 तक।

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विकट संकष्टी चतुर्थी के दिन बन रहे हैं शुभ योग
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विकट संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा के लिए शुभ योग का निर्माण होने जा रहा है।

सर्वार्थसिद्धि योग👉 यह योग सभी प्रकार के कार्यों में सफलता प्रदान करने वाला माना जाता है।

अमृत सिद्धि योग👉 यह योग किसी भी कार्य को सिद्ध करने और उसमें शुभता लाने के लिए बहुत ही उत्तम माना जाता है।

शिववास योग👉 इस योग में भगवान शिव कैलाश पर विराजमान रहते हैं, जिससे पूजा और आराधना का फल शीघ्र मिलता है।

चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा का महत्व
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विकट संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करने से व्यक्ति के जीवन में आने वाली सभी समस्याएं दूर हो सकती है और मनोकामनाएं पूरी हो सकती है और व्यापारियों को भी उत्तम परिणाम मिलते हैं।

विकट संकष्टी चतुर्थी व्रत पूजा विधि
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विकट संकष्टी चतुर्थी के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और शांत मन से व्रत का संकल्प लें।
इस दिन दिनभर उपवास रखने की परंपरा है।

घर के पूजा स्थल को साफ कर एक लाल या पीले वस्त्र पर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। अगर प्रतिमा न हो, तो एक साबुत सुपारी को गणेश जी का रूप मानकर पूजा करें।

अब भगवान गणेश को पंचामृत (दूध, दही, शहद, घी और शक्कर) से स्नान कराएं, फिर स्वच्छ जल से उन्हें शुद्ध करें।

इसके बाद गणेश जी को सिंदूर, अक्षत, चंदन, गंध, गुलाल, फूल, दूर्वा और जनेऊ अर्पित करें।

उनकी प्रिय मिठाई मोदक और मौसमी फल उन्हें भोग स्वरूप चढ़ाएं।

शाम को चंद्रोदय के समय चंद्रमा को अर्घ्य दें।

इसके बाद भगवान गणेश की दीप-धूप से आरती करें और अंत में व्रत का पारण करें।

विकट संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
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किसी समय एक राज्य में धर्मकेतु नाम का एक ज्ञानी ब्राह्मण रहता था जिसकी दो पत्नी थीं जिनमें एक का नाम सुशीला था और दूसरी का नाम चंचला था।

सुशीला बड़े ही धार्मिक स्वभाव की थी जबकि चंचला का धर्म के प्रति बिल्कुल भी लगाव नहीं था। व्रत करने के कारण सुशीला बहुत कमजोर हो गई थी, जबकि चंचला की सेहत अच्छी थी। कुछ समय बाद सुशीला को एक पुत्री तो चंचला ने पुत्र की प्राप्ति हुई। ये देख चंचला ने सुशीला से कहा कि तुम इतने व्रत-उपवास करती हो तब भी तुम्हें पुत्री प्राप्त हुई जबकि मैंने तो कुछ भी नहीं किया लेकिन फिर भी मुझे पुत्र प्राप्त हुआ। चंचला की ये बातें सुशीला को बहुत बुरी लगी।

जब विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत आया तो सुशीला ने पूरे मन से ये व्रत किया। सुशीला की भक्ति से गणेशजी प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे एक पुत्र होने का वरदान भी दिया। सुशीला की ये कामना शीघ्र ही पूरी हो गई लेकिन दुर्भाग्यवश उसके पति धर्मकेतु की मृत्यु हो गई। जिसके बाद चंचला अलग घर में रहने लगी।

सुशीला पति के घर में रहकर ही अपने बच्चों का पालन करने लगी। सुशीला का पुत्र बहुत ज्ञानी था, जिससे उसने अपना घर धन-धान्य से भर दिया।

ये देख चंचला को ईर्ष्या होने लगी और मौका मिलते ही उसने सुशीला की पुत्री को कुएं में धकेल दिया। लेकिन भगवान गणेश ने उसकी रक्षा की। चंचला ने जब ये देखा कि भगवान गणेश स्वयं सुशीला के परिवार की रक्षा कर रहे हैं तो उसे अपने द्वारा किए गए कर्मों पर बड़ा पछतावा आया और उसने तुरंत ही सुशीला से माफी मांग ली। फिर सुशीला के कहने पर चंचला ने भी विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया। जिससे उसके घर पर गणेश जी की कृपा बरसने लगी।

गणेश जी की आरती
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जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी।
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
पान चढ़े फल चढ़े, और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
‘सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी।
कामना को पूर्ण करो, जाऊं बलिहारी॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
भगवान गणेश की जय, पार्वती के लल्ला की जय
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🌿𝐓𝐫𝐢𝐤𝐚𝐥𝐝𝐚𝐫𝐬𝐡𝐢🌿
𝐓𝐢𝐦𝐞. 𝟎𝟔:𝟓𝟎 𝐚𝐦

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