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पंचकोशों का जागरण आत्मोन्नति एवं आत्मसाक्षात्कार का मार्ग
वाराणसी। मानव जीवन के समग्र विकास में पंचकोशों की साधना एवं जागरण का विशेष महत्व है। वैदिक एवं उपनिषदिक परंपरा के अनुसार मानव चेतना पाँच कोशों—अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय तथा आनन्दमय कोश—से निर्मित है। इन पंचकोशों का क्रमिक जागरण व्यक्ति को साधारण जीवन से उठाकर आत्मबोध, आत्मसाक्षात्कार एवं ईश्वरानुभूति की ओर अग्रसर करता है।
वक्ताओं ने बताया कि अन्नमय कोश शरीर एवं इन्द्रिय चेतना का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि प्राणमय कोश जीवनी शक्ति एवं साहस का आधार है। मनोमय कोश विचार, विवेक एवं चिंतन क्षमता को विकसित करता है। विज्ञानमय कोश करुणा, संवेदना, आत्मीयता एवं परोपकार की भावनाओं को जागृत करता है। वहीं आनन्दमय कोश आत्मा के वास्तविक स्वरूप का बोध कराते हुए व्यक्ति को परम शांति, संतोष एवं आनंद की अनुभूति प्रदान करता है।
बताया गया कि पंचकोशों की साधना से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं मत्सर जैसे आंतरिक विकारों का शमन होता है तथा मनुष्य का व्यक्तित्व परिष्कृत होकर समाज एवं राष्ट्र के लिए प्रेरणास्रोत बनता है। उपनिषदों एवं शिवगीता में वर्णित इस ज्ञान के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को उत्कृष्ट दिशा प्रदान कर सकता है।
वक्ताओं ने कहा कि भगवान श्रीराम के परम भक्त हनुमान जी पंचकोशीय साधना एवं निष्काम सेवा के आदर्श उदाहरण हैं। उन्होंने सदैव स्वयं को प्रभु सेवा के लिए समर्पित रखा और भक्ति, ज्ञान तथा आत्मसमर्पण का अनुपम संदेश दिया।
कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं एवं साधकों से आत्मपरिष्कार, सदाचार तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए पंचकोश साधना को जीवन में अपनाने का आह्वान किया गया।