
श्रीकुल पीठाधीश्वर डॉ. सचिन्द्रनाथ महाराज के करकमलों से वितरित हुए मनोनयन एवं दायित्व पत्र।
भुवनेश्वर, उड़ीसा। ब्रह्मराष्ट्र एकम विश्व महासंघ न्यास काशी के संस्थापक अध्यक्ष एवं श्रीकुल पीठाधीश्वर श्री श्री 1008 डॉ. सचिन्द्रनाथ महाराज जी की प्रेरक एवं गरिमामय उपस्थिति में उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर में संगठन विस्तार एवं नवनियुक्त पदाधिकारियों के सम्मान समारोह का आयोजन किया गया।
इस विशेष कार्यक्रम में संस्था के राज्य एवं जिला स्तर पर नियुक्त लगभग 50 नए पदाधिकारियों को दायित्व पत्र एवं मनोनयन पत्र प्रदान किए गए। श्रीकुल पीठाधीश्वर डॉ. सचिन्द्रनाथ महाराज जी ने अपने करकमलों से सभी नवनियुक्त पदाधिकारियों को मनोनयन एवं दायित्व पत्र सौंपते हुए उनके उज्ज्वल कार्यकाल की शुभकामनाएं दीं और आशीर्वाद प्रदान किया।
अपने संबोधन में महाराज जी ने कहा कि ब्रह्मराष्ट्र एकम विश्व महासंघ न्यास केवल एक संगठन नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन, राष्ट्र चेतना के जागरण, सेवा, संस्कार और आध्यात्मिक उत्थान के संकल्प के साथ कार्य करने वाला व्यापक अभियान है। उन्होंने सभी नवनियुक्त पदाधिकारियों से निष्ठा, अनुशासन और पूर्ण समर्पण के साथ समाज एवं राष्ट्रहित में कार्य करने का आह्वान किया।
महाराज जी ने संगठन के विस्तार को गति देने के साथ ही संस्था के आगामी चार प्रमुख प्रकल्पों को सफल बनाने में पदाधिकारियों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि संगठन का प्रत्येक कार्यकर्ता अपने दायित्व को केवल पद न मानकर सेवा और साधना का माध्यम समझे तथा संस्था के उद्देश्यों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए पूरी निष्ठा के साथ कार्य करे।
कार्यक्रम में पूर्णेंदु जी, रजनीकांत जी, देबस्मिता जी, अश्विनी जी, आशीष जी, दिलीप जी, कमलेश जी एवं सूर्यप्रकाश जी सहित संस्था के अनेक पदाधिकारी और कार्यकर्ता उपस्थित रहे। इस दौरान उड़ीसा के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में सनातन संस्कृति, सामाजिक सेवा और राष्ट्र चेतना से जुड़े लोगों ने भी सहभागिता की।
नवनियुक्त पदाधिकारियों ने श्रीकुल पीठाधीश्वर डॉ. सचिन्द्रनाथ महाराज जी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए संगठन के प्रति पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करने का संकल्प लिया।
पूरे कार्यक्रम का वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा, संगठनात्मक उत्साह और राष्ट्र एवं सनातन संस्कृति के प्रति समर्पण की भावना से ओत-प्रोत रहा।
जय जगन्नाथ।
जय विश्वनाथ।