BHU के खेल मैदानों की ₹8.61 लाख की बुकिंग राशि पर उठे सवाल, RTI के बाद अधिकारियों को अलग-अलग विधिक नोटिस l

मैदानों से आय तो बताई गई, लेकिन किस मैदान से कितनी रकम मिली और किसे दी गई सुविधा—इसका पूरा रिकॉर्ड अब भी नहीं.

वाराणसी, 29 अगस्त 2026। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के खेल मैदानों के इस्तेमाल और उनसे प्राप्त होने वाली बुकिंग राशि को लेकर पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब में विश्वविद्यालय क्रीड़ा परिषद ने दो वर्षों में कुल ₹8,61,000 की ग्राउंड बुकिंग राशि प्राप्त होने की जानकारी दी है, लेकिन किस मैदान से कितनी राशि आई, मैदान किस व्यक्ति, संस्था या एजेंसी को दिया गया और किस उद्देश्य से बुकिंग की गई—इसका विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं कराया गया है।

मामले को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधिवक्ता संतोष कुमार त्रिपाठी ने संबंधित अधिकारियों को अलग-अलग विधिक नोटिस भेजते हुए शेष सूचनाएं और अभिलेख उपलब्ध कराने की मांग की है।

नोटिस पाने वालों में विश्वविद्यालय क्रीड़ा परिषद की केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी एवं महासचिव डॉ. कविता वर्मा, अपीलीय प्राधिकारी प्रो. अर्चना सिंह, ब्रोचा मैदान की केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी एवं मैदान प्रभारी निर्मला होरो तथा चिकित्सा विज्ञान संस्थान के निदेशक शामिल हैं।

RTI में मांगी थी मैदान, बुकिंग और शुल्क से जुड़ी विस्तृत जानकारी

अधिवक्ता संतोष कुमार त्रिपाठी ने 16 जुलाई 2026 को आरटीआई आवेदन संख्या BANHU/R/E/26/00745 के माध्यम से बीएचयू के विभिन्न खेल मैदानों के इस्तेमाल, निजी प्रशिक्षकों और खेल अकादमियों को मैदान दिए जाने, अनुमति प्रक्रिया, शुल्क, बुकिंग तथा विश्वविद्यालय को प्राप्त होने वाली राशि से संबंधित जानकारी और दस्तावेज मांगे थे।

मांगी गई सूचना पूरी तरह उपलब्ध नहीं होने पर 9 अगस्त 2026 को प्रथम अपील संख्या BANHU/A/E/26/00203 दाखिल की गई।

₹8.61 लाख की राशि मिली, लेकिन मैदानवार हिसाब नहीं

क्रीड़ा परिषद के जवाब के अनुसार वर्ष 2024-25 में ₹5,19,500 और वर्ष 2025-26 में ₹3,41,500 बुकिंग शुल्क के रूप में प्राप्त हुए। इस प्रकार दो वर्षों में कुल ₹8,61,000 की राशि मिलने की जानकारी दी गई।

हालांकि आरटीआई में केवल कुल राशि नहीं, बल्कि उससे जुड़े विस्तृत रिकॉर्ड और दस्तावेज मांगे गए थे। अब नोटिस के माध्यम से सवाल उठाया गया है कि आखिर किस मैदान की बुकिंग कब हुई, किस व्यक्ति या संस्था ने भुगतान किया और किस उद्देश्य से मैदान उपलब्ध कराया गया।

बाहरी प्रतिभागियों पर रोक तो बाहरी एजेंसियों को सुविधा कैसे?

क्रीड़ा परिषद की ओर से दिए गए जवाब में गैर-बीएचयू प्रतिभागियों को मैदानों में अनुमति नहीं होने की बात कही गई है। वहीं दूसरी ओर, मांग के आधार पर बाहरी एजेंसियों को किराये पर क्रीड़ा सुविधाएं उपलब्ध कराए जाने का भी उल्लेख है।

इसी विरोधाभासी स्थिति को स्पष्ट करने के लिए नोटिस में बाहरी एजेंसियों को मैदान या खेल सुविधा उपलब्ध कराने की व्यवस्था, संबंधित आदेश, अनुमति और बुकिंग से जुड़े दस्तावेज मांगे गए हैं।

शुल्क दर तय है तो मंजूरी और वसूली का रिकॉर्ड भी मांगा

क्रीड़ा परिषद की 7 अगस्त 2025 की शुल्क-दर सूची में बीएचयू से बाहर की संस्थाओं के लिए प्रतियोगिता, मैच और व्यावसायिक खेल प्रयोजनों के लिए अलग-अलग दरों का उल्लेख किया गया है।

विधिक नोटिस में सवाल किया गया है कि इस शुल्क सूची को किस स्तर पर मंजूरी मिली, यह कब से लागू हुई और इसके आधार पर कितनी बुकिंग हुई तथा कितनी राशि वसूल की गई। इससे जुड़े दस्तावेज और रिकॉर्ड भी मांगे गए हैं।

ब्रोचा मैदान में अकादमियों को जगह देने की प्रक्रिया पर भी सवाल

ब्रोचा मैदान से संबंधित 16 अक्टूबर 2025 के दस्तावेज में खेल अकादमियों को मैदान उपलब्ध कराने के लिए आवेदन, अकादमी के पंजीकरण और अनुभव, परीक्षण प्रक्रिया तथा सफल आवेदक के साथ समझौते जैसी प्रक्रिया का उल्लेख है।

नोटिस में यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि क्या वास्तव में मैदान आवंटन के दौरान यही प्रक्रिया अपनाई गई। साथ ही आवेदन, चयन, अनुमति और समझौते से जुड़े दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां भी मांगी गई हैं।

रुहिया ग्राउंड पर मांगी गई जानकारी अब भी अधूरी

मामले में रुहिया ग्राउंड को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल उठाए गए हैं। आरटीआई के माध्यम से मैदान के इस्तेमाल, निजी प्रशिक्षकों और खेल अकादमियों की गतिविधियों, अनुमति, मैदान उपलब्ध कराने और शुल्क से संबंधित जानकारी मांगी गई थी।

25 अगस्त 2026 को दिए गए जवाब में केवल इतना बताया गया कि रुहिया ग्राउंड चिकित्सा विज्ञान संस्थान के अधीन है। लेकिन मैदान का इस्तेमाल कौन कर रहा है, किसे अनुमति दी गई, किस आधार पर मैदान दिया गया और उससे कोई शुल्क लिया गया या नहीं—इससे संबंधित मांगी गई विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।

इसी कारण चिकित्सा विज्ञान संस्थान के निदेशक को भी अलग से विधिक नोटिस भेजा गया है।

25 अगस्त के जवाब के बाद भी नहीं सुलझे सवाल

प्रथम अपील के बाद 25 अगस्त 2026 को जवाब दिया गया, लेकिन अधिवक्ता संतोष कुमार त्रिपाठी का कहना है कि केवल मैदानों के प्रशासनिक प्रबंधन की जानकारी देने से मूल आरटीआई के सवालों का जवाब पूरा नहीं हो जाता।

आरटीआई में मुख्य रूप से यह जानना चाहा गया था कि मैदानों का उपयोग कौन कर रहा है, किसे अनुमति दी गई, अनुमति का आधार क्या है, कितना शुल्क लिया गया और इससे जुड़े आधिकारिक रिकॉर्ड क्या हैं।

उनका कहना है कि अभी तक प्राप्त जवाबों में इन सवालों से संबंधित पूरी जानकारी और दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए हैं।

15 दिनों में जवाब देने की मांग, नहीं तो केंद्रीय सूचना आयोग में मामला

अलग-अलग अधिकारियों को भेजे गए विधिक नोटिस में नोटिस प्राप्त होने के 15 दिनों के भीतर शेष सूचनाएं और उपलब्ध अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराने की मांग की गई है।

निर्धारित समय सीमा में संतोषजनक जवाब नहीं मिलने की स्थिति में केंद्रीय सूचना आयोग में द्वितीय अपील तथा अन्य उपलब्ध कानूनी उपाय अपनाने की बात कही गई है।

अधिवक्ता संतोष कुमार त्रिपाठी ने कहा कि, “मूल आरटीआई में जिन सूचनाओं और दस्तावेजों की मांग की गई थी, उनका प्राप्त जवाबों से मिलान करने के बाद ही ये नोटिस भेजे गए हैं। मेरा उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाना नहीं है। सवाल केवल इतना है कि विश्वविद्यालय के खेल मैदानों के इस्तेमाल, बुकिंग, शुल्क और प्राप्त राशि से जुड़े जो रिकॉर्ड मांगे गए हैं, उन्हें स्पष्ट रूप से सामने रखा जाए। सार्वजनिक संसाधनों से जुड़ी जानकारी में पारदर्शिता होनी चाहिए।”

उन्होंने कहा कि संबंधित अधिकारियों से शेष सूचनाओं और अभिलेखों का स्पष्ट विवरण मांगा गया है। यदि निर्धारित समय के भीतर पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती है तो मामले को केंद्रीय सूचना आयोग के समक्ष आगे बढ़ाया जाएगा।

अब निगाह इस बात पर रहेगी कि ₹8.61 लाख की बुकिंग राशि का मैदानवार और बुकिंगवार पूरा विवरण सामने आता है या फिर मामला सूचना आयोग तक पहुंचता है।

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